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मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

डॉ. मधु भारती की बाल कविता 'चिड़िया फुर्र उड़ी'

इक चिड़िया कूदी आँगन में,
ढूँढ रही कुछ दाने।
पाए कुछ चावल के दाने,
लगी कुतर कर खाने।
मस्ती में भर, कभी फुदकती,
चीं चीं लगती गाने।
मुँह में एक मिर्च का टुकड़ा,
पहुँच गया अनजाने।
सी सी कर चिल्लाई, नल पर
पहुँची वह घबराकर।
ताली बजा हँसे सब बच्चे,
फुर्र उड़ी शरमाकर।
डॉ. मधु भारती

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