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शुक्रवार, 26 जनवरी 2018

दामोदर अग्रवाल की बाल कविताएं

टीचर जी


टीचर जी, ओ टीचर जी
गिनती खूब सिखाओ जी,
लेकिन पहले बल्बों में
बिजली तो ले आओ जी!
सूरज जी, ओ सूरज जी
कभी देर से आओ जी,
रोज पहुँचकर, सुबह सुबह
यों ना मुझे जगाओ जी!
छुट्टी जी, ओ छुट्टी जी
लो यह टॉफी खाओ जी,
बस, इतनी सी विनती है
जल्दी-जल्दी आओ जी।
पापा जी, ओ पापा जी
बहुत न रोब जमाओ जी,
दूध कटोरी में पीकर
चम्मच से खिलाओ जी।

कोई लाके मुझे दे

कुछ रंग भरे फूल
कुछ खट्ठे-मीठे फल,
थोड़ी बाँसुरी की धुन
थोड़ा जमुना का जल—
कोई लाके मुझे दे!
एक सोना जड़ा दिन
एक रूपों भरी रात,
एक फूलों भरा गीत
एक गीतों भरी बात—
कोई लाके मुझे दे!
एक छाता छाँव का
एक धूप की घड़ी,
एक बादलों का कोट
एक दूब की छड़ी—
कोई लाके मुझे दे!
एक छुट्टी वाला दिन
एक अच्छी सी किताब,
एक मीठा सा सवाल
एक नन्हा सा जवाब—
कोई लाके मुझे दे!

जादू  की एक गठरी

जादू की एक गठरी लाऊँ
बच्चों में बच्चा बन जाऊँ!
एक जेब से शेर निकालूँ
एक जेब से भालू,
शेर बहुत भोला-भाला हो
भालू हो झगड़ालू।
दोनों को झटपट खा जाऊँ,
जादू की जो गठरी लाऊँ।
चूहा एक निकल गठरी से
हाथी को दौड़ाए,
हाथी डर से थर-थर काँपे
बिल में जा छुप जाए।
चूहे का फोटो छपवाऊँ,
जादू की जो गठरी लाऊँ।
एक जेब से पिज्जा निकले
एक जेब से डोसा,
परियाँ पिज्जा खाएँ, तोता
माँगे गरम समोसा।

बड़ी शरम की बात

बड़ी शरम की बात है बिजली,
बड़ी शरम की बात!
जब देखो गुल हो जाती हो
ओढ़ के कंबल सो जाती हो।
नहीं देखती हो यह दिन है, या यह काली रात है बिजली
बड़ी शरम की बात,
बड़ी शरम की बात है बिजली, बड़ी शरम की बात!

हम गाना गाते होते हैं,
या खाना खाते होते हैं,
पता नहीं चलता थाली में, किधर दाल औ भात, है बिजली
बड़ी शरम की बात,
बड़ी शरम की बात है बिजली, बड़ी शरम की बात!

जाओ मगर बता के जाओ,
कुछ तो शिष्टाचार दिखाओ,
नोटिस दिए बिना चल देना, तो भारी उत्पात है बिजली
बड़ी शरम की बात,
बड़ी शरम की बात है बिजली, बड़ी शरम की बात!

दामोदर अग्रवाल 
जन्म- 4 जनवरी, 1932, वाराणसी, उत्तर प्रदेश 
मोतीलाल नेहरू कालेज में अंग्रेजी के प्राध्यापक रहे. 
बच्चों और खासकर किशोरों के लिए बेजोड़ लेखन. 
निधन – 1 जनवरी, 2009, बंगलौर

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