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शुक्रवार, 20 मई 2011

कब तक कब तक - नागेश पांडेय ' संजय '



कब तक कब तक
बालगीत : डा. नागेश पांडेय ' संजय ' 

भूख लगी है,
कब तक कब तक?
खाना-पानी, दें ना नानी
जब तक जब तक, तब तक तब तक।

टीचर से डर,
कब तक कब तक?
रहे अधूरा होम वर्क जी!
जब तक जब तक, तब तक तब तक।

रिमझिम रिमझिम 
कब तक कब तक?
बादल के झोलों में है जल,
जब तक जब तक, तब तक तब तक।

कहो अँधेरा
कब तक कब तक?
हो ना जाये सुखद सवेरा
जब तक जब तक, तब तक तब तक।

मेल-दोस्ती
कब तक कब तक?
जब तक झगड़े को हम रगड़ें
तब तक तब तक, तब तक तब तक।

वीरों की जय
कब तक कब तक?
जब तक सूरज, चाँद, सितारे
तब तक तब तक, तब तक तब तक।

ये सवाल जी
कब तक कब तक?
दे पायें जब तक जवाब हम,
तब तक तब तक, तब तक तब तक।

कब तक कब तक? कब तक कब तक?
जब तक जब तक, तब तक तब तक।
चित्र : गूगल सर्च से साभार

बुधवार, 18 मई 2011

दो कविताएं : लगी पूंछ में आग और लौकी




दो कविताएं  : डा. आर. पी. सारस्वत 
लगी पूछ में आग

नकली पूंछ लगाकर गोलू 
बने वीर  हनुमान 
जा रावण -दरबार वहां पर 
किया राम गुणगान . 
गदा घुमा कर गोलू भैया 
ठोक रहे थे ताल .
डर के मारे लंका वालों
 का था पतला हाल . 
रावण के कहने पर ज्यों ही
 लगी पूंछ में आग . 
नकली पूंछ फेंक कर गोलू 
गए वहां से भाग . 
चौपट हुयी रामलीला तब 
बच्चे हँसे ठठाकर . 
गोलू था डरपोक , हुई 
गलती हनुमान बनाकर . 


लौकी

बाबा फिर ले आए लौकी,
 सब्जी मंडी अटी पड़ी थी,
 गोभी, घुइयाँ सटी पड़ी थीं।
 कदू शिमला मिर्च, करेला, 
गाजर, मूली कच्चा केला, 
पर बाबा जी ने फिर-फिर के
 नजर हाय लौकी पर रोकी।

इसको लेकर घर जाएँगे, 
अब लौकी के गुण गाएँगे। 
दवा नहीं हो जिसको खानी, 
उसको यही पड़ेगी खानी। 
काट-पीट कर झट अम्मा ने 
गुस्से में आ लौकी छौंकी।
डा. आर. पी. सारस्वत 
जन्म : 1 अप्रैल , 1954 ,मथुरा 
प्रकाशित बाल कविता संग्रह :
 नानी का गाँव , चटोरी चिड़िया 
संपर्क : पन्त विहार , सहारनपुर 
मो.-9897792500


चित्र गूगल सर्च से साभार 

शनिवार, 14 मई 2011

इब्न बतूता - सर्वेश्वर दयाल सक्सेना



बालगीत : सर्वेश्वर दयाल सक्सेना 
इब्न बतूता , पहन के जूता 

निकल पड़े तूफान में . 
थोड़ी हवा नाक में घुस गई  , 
थोड़ी घुस गई कान में .
कभी नाक को , कभी कान को 
मलते इब्न बतूता . 
इसी बीच में निकल पड़ा 
उनके पैरों का जूता .
उड़ते-उड़ते जूता उनका 
जा पहुँचा जापान में . 
इब्न बतूता खड़े रह गए 
मोची की दूकान में . 

 सर्वेश्वर  दयाल सक्सेना 
जन्म : 15.09.1927 , पिकारा बस्ती 
हिंदी कविता के सशक्त हस्ताक्षर ; 
बाल कविता के गौरव .
बच्चों के अपने कवि .
प्रमुख बाल कविता संग्रह :  बतूता का जूता , मंहगू की टाई ,बिल्ली के बच्चे , भों भों खों खों 
निधन :  24.09.1983



बुधवार, 11 मई 2011

रमेश तैलंग के दो बालगीत


ताती ताती एक चपाती

बाल गीत  : रमेश तैलंग 
ताती ताती एक चपाती , 
दिखी तवे पर पेट फुलाती .
बिल्ली मौसी बोली- 'म्याऊं !
भूख लगी ,मैं तुझको खाऊं .'
सुनकर उछली दूर चपाती ,
बोली फिर आँखें मटकती -
'मौसी पहले मक्खन ला ,
फिर चाहे मुझको खा जा.'
देख चपाती के ठनगन,
बिल्ली ले आई मक्खन .
गुर्राकर फिर बोली - म्याऊं !
अब तो मैं तुझको खा जाऊं ?'
सुनकर उछली दूर चपाती ,
बोली फिर आँखे मटकाती-
'हाँ, हाँ, पहले गुड़ तो ला .
फिर चाहे मुझको खा जा .'
बिल्ली चल दी गुड लाने ,
लगी लौटकर झुँझलाने ,
म्याऊं ! म्याऊं ! म्याऊं ! म्याऊं !
अब मैं खाऊं !अब मैं खाऊं !
मन ही मन में डरी चपाती ,
सोचा- अब तो मरी चपाती .
चिढकर बोली - 'खा नकटी,'
बिल्ल्ली गुस्से में झपटी .
खा ली चप- चप चप्प चपाती , 
हप्प चपाती , गप्प चपाती . 

बालगीत

लाओ मेरी चॉकलेट

रमेश तैलंग

दफ्तर से फिर आए लेट,
पापा बहुत कराया वेट,
प्रॉमिज तोड़ा है अपना
अब, लाओ मेरी चॉकलेट।

पाँच बजे आ जाना था,
साथ हमारे जाना था,
बाहर खाना खाना था,
अच्छा-खासा मूड हमारा
कर डाला पर मटियामेट।

वादा फिर करना होगा,
जुर्माना भराना होगा,
झगड़ा अब वरना होगा,
देखो, कैसे पिचक-पिचककर
हुआ हमारा आधा पेट।
अब, लाओ मेरी चॉकलेट।
रमेश तैलंग 
  जन्म: 2 जून ,1946 .टीकमगढ़  
प्रकाशित कृतियाँ : एक चपाती और अन्य बाल कविताएँ , कनेर के फूल , इक्यावन बालगीत 
संपर्क :   गणेश नगर ,शकरपुर , दिल्ली -92   


चित्र गूगल सर्च से साभार


सोमवार, 9 मई 2011

मिस्टर मच्छर - चन्द्रपाल सिंह यादव ' मयंक '






 बाल कविता :चन्द्रपाल सिंह यादव ' मयंक ' 
मिस्टर मच्छर रात-रात भर ,
गाना गाते भन-भन-भन.
उनका गाना बड़ा सुहाना ,
लेकिन उनसे डरते हम .
कभी नाक में , कभी कान में ,
वह चुटकी ले लेते हैं .
मच्छरदानी में घुस कर हम , 
उनको चकमा देते हैं . 
वह बाहर से झूम-झूम कर
 सा रे गा मा गाते हैं . 
हम अंदर लेटे - लेटे ही , 
मुक्का उन्हें दिखाते हैं . 
चन्द्रपाल सिंह यादव ' मयंक ' 
जन्म : १ सितम्बर , १९२५ , कानपुर
शिक्षा : एम्. ए. (हिंदी ), एल-एल. बी .  
५० से अधिक पुस्तकें प्रकाशित 
निधन :  २६ जून ,२००० 

शनिवार, 7 मई 2011

कानाबाती कुर्र




शिशुगीत : बाल कृष्ण गर्ग 
मेढक बोले टर्र ,
बर्राती है बर्र .
जूता बोले चर्र ,
मोटर चलती घर्र .
मम्मी सोतीं खर्र ,
पापा जाते डर्र .
चिड़िया उडती फुर्र ,
कानाबाती कुर्र .
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नाकाबाती  छीं
सर्दी में थर -थर ,
गर्मी में   लू-लू.
तुम करते हा-हा ,
हम करते हू-हू.
मीठा-मीठा गप,
कड़वा-कड़वा थू.
नाकाबाती  छीं,
कानाबाती  कू .
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सबसे अच्छी नानी 
दूध न पीता गुड्डा , 
हुआ तभी तो बुड्ढा .
खाती दाल न रोटी , 
फिर भी गुड़िया मोटी . 
दिन भर नटखट भैया ,
करता धम्मक -धय्या .
कपडा इतना मँहगा ,
बहना मांगे लंहगा . 
चिढ़ जाते जब चाचा , 
मारे मुझे तमाचा .
पापा करते गड़बड़ ,
मम्मी करतीं बडबड .
खों-खों खाँसे दादी , 
तम्बाकू  की आदी .
सबसे अच्छी नानी ,
कहती रोज कहानी . 
बाल कृष्ण गर्ग 
जन्म : १५ मई , १९४३ , हाथरस 
प्रकाशित कृतियाँ : रोचक शिशु गीत रोचक बालगीत , आटे बाते दही चटाके 
आपके संपादन संगीत मासिक का बाल संगीत अंक (१९८१) साहित्य जगत में विशेष चर्चित . 
संपर्क : ६४७, मुरसान गली , हाथरस 

रविवार, 1 मई 2011

द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी की बाल कविता : लाया हूं जी मैं गुब्बारे

लाया हूं जी मैं गुब्बारे
हरे, गुलाबी, लाल, बैंगनी, 
नीले नीले, पीले पीले। 
लाया हूं जी में गुब्बारे, 
प्यारे प्यारे ये चमकीले 
दस पैसे में एक मिलेगा,
मन चाहे जैसा ले लो तुम। 
आसमान के तारे है ये, 
गुब्बारे, इनसे खेलो तुम ।
यह लो मीरा, यह लो हीरा,
देखो तो यह सुन्दर कैसा । 
रूठो मत, लो रेखा रानी,
घर से ले आओ दस पैसा ।
अच्छा जी अब जाता हूँ मैं,
फिर आऊँगा, गाँव तुम्हारे। 
पर न भूलना रंग-बिरंगे, 
ये मेरे गुब्बारे प्यारे।
द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी 
(हिंदी के मूर्द्धन्य बाल कवि)
जन्म : 1 दिसंबर ,1916 ,आगरा 
बाल गीतायन उनकी प्रसिद्ध कृति है,
जिसमे पहली बार बच्चों के लिए सर्वाधिक बाल कविताएँ प्रकाशित हुईं थीं।
निधन : 29 अगस्त 1998,  आगरा में