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शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

दूँगी फूल कनेर के /अनंत कुशवाहा

किशोर कविता : अनंत कुशवाहा
आना मेरे गाँव , तुम्हे मैं
दूँगी फूल कनेर के .
कुछ पक्के , कुछ कच्चे घर हैं ,
एक पुराना ताल है .
सड़क बनेगी , सुनती हूँ -
इसका नंबर इस साल है .
चखते आना , टीले ऊपर
कई पेड़ हैं बेर के .
आना मेरे गाँव , तुम्हे मैं
दूँगी फूल कनेर के .
खड़िया -पाटी -कापी-बस्ते
लिखना पढ़ना रोज है .
खेलें-कूदे कभी न फिर तो
यह सब लगता बोझ है .
कई मुखौटे तुम्हें दिखाउंगी
मिटटी के शेर के .
आना मेरे गाँव , तुम्हे मैं
दूँगी फूल कनेर के .
बाबा ने था पेड़ लगाया ,
बापू ने फल खाए हैं .
भाई कैसे ! उसे काटने
को रहते ललचाए हैं .
मेरे बचपन में ही आ
दिन कैसे अंधेर के .
आना मेरे गाँव , तुम्हे मैं
दूँगी फूल कनेर के .
हँसना - रोना तो लगता ही
रहता है हर खेल में .
रूठे , किट्टी कर ली , लेकिन
खिल उठते हैं मेल में .
मगर देखना क्या होता है
मेरी चिट्ठी फेर के .
आना मेरे गाँव , तुम्हे मैं
दूँगी फूल कनेर के .

अनंत कुशवाहा
जन्म : १० जुलाई , १९३८ , जौनपुर (उ.प्र.)
बाल हंस के संपादक रहे .
बच्चों के लिए बहुत ही सुंदर व्यंग्य चित्र बनाए .
 ठोला राम , कूँ-कूँ , मुनीम जी उनके प्रसिद्द चरित्र हैं . 
जयपुर में निधन हो गया . 
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यह किशोर कविता 
'बाल हंस' के जनवरी, द्वितीय, १९९५ अंक में 
इस रूप में प्रकाशित हुयी थी. 

5 टिप्‍पणियां:

  1. naagesh hai. anantji ke is kishore geet ko padh kar sachmuch jee juda gaya. bahut dinon baad anant ji ke rachna se mulaqaat hui. kanpur ke baad mile varshon ho gaye. dukh aur hairani ki baat yah hai ki mujhe unke nidhan ke khabar bhi nahi mili. aapke blog par padh kar aansoo aagaye. bhai kahan hain unke aise hi aur geet....khoj kar nikalo.

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  2. आदरणीय रमेश तैलंग जी ,
    आपकी टिप्पणी से आँखें भीग गयी . यह बाल साहित्य की बहुत बड़ी विडंबना नहीं तो क्या है ? जो लोग नि:स्वार्थ भाव से बाल साहित्य के नाम पर अपना जीवन खपा देतें हैं , उनकी मृत्यु कितनी गुमसुम सी चुप चुप . जैसे किसी बियाबान में घोर सन्नाटा हो .
    बाल साहित्यकारों को सजग होना पड़ेगा .
    कुशवाहा जी की बहुतेरी कविताएँ मेरे पास हैं , समय-समय पर इन्हें उपलब्ध करता रहूँगा . बाल साहित्य को पहचान दी उन्होंने .

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  3. बहुत ही सुन्दर कविता है, बचपन की याद आ जाती है पढ़कर

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