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शनिवार, 8 जनवरी 2011

रहे दौड़ते गधेराम

 बालगीत : डा. शेषपाल सिंह ' शेष ' 

झनकू राम कुम्हार गधे पर , 
डंडे पेल रहे थे . 
गधेराम सुस्ती में डंडे ,
तन पर झेल रहे थे . 
झनकू परेशान थे , कैसे 
आगे उन्हें बढ़ाएं ? 
जल्दी पहुंचे और समय से 
अपना काम कराएँ . 
पीट-पीट कर थके बहुत तब 
सूझ अनोखी आई . 
एक सिरे पर डंडे के  झट 
हरी घास लटकाई . 
बैठ पीठ पर , बड़े मजे से , 
की हरियाली आगे .
चारे के लालच में लपके , 
गधेराम जी भागे .
गधेराम जी जितना बढ़ते ,
 चारा आगे बढ़ता .
खाने की कोशिश करते पर , 
दावं न उनका चढ़ता . 
रहे दौड़ते गधेराम जी , 
किंतु नहीं खा पाए . 
झनकू सफल सूझ पर अपनी , 
मन ही मन हर्षाए .

जन्म : ४ मई , १९५२ , आगरा 
आपने बाल साहित्य पर शोध कार्य कर पी-एच. डी. की उपाधि प्राप्त की है. 
बच्चों के लिए उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं . 
संपर्क :बालाजी नगर , आगरा  

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